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एक चक्रवर्ती सम्राट के न होने से विभिन्न माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी तथा  प्रजापीड़क हो गये थे । मथुरा का कंस, मगध का जरासंध, चेदिदेश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के दुर्योधन प्रमुख, कौरव सभी दुष्ट, विलासी, ऐश्वर्य-मदिरा में प्रमत्त तथा दुराचारी थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता, कूटनीतिक चातुर्य तथा अपूर्व सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों का मूलोच्छेद किया तथा धर्मराज कहलाने वाले अजातशत्रु युधिष्ठिर को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर आर्यों के अखण्ड, चक्रवर्ती, सार्वभौम साम्राज्य  को साकार किया ।

प्रस्तुत पुस्तक इसी दृष्टि से तैयार की गई है । आशा है, नैतिक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं क्रो विविध संदभों में समझकर बालकों में निश्चित परिवर्तन होगा।

‘कालजयी कथाकार’ शृंखला में प्रस्तुत हैं धर्मवीर भारती की दस प्रतिनिधि कहानियांµ ‘कुलटा’, ‘गुलकी बन्नो’, ‘धुआं’, ‘सावित्री नंबर दो’, ‘यह मेरे लिए नहीं’, ‘हिंदू या मुसलमान’, ‘बंद गली का आखिरी मकान’, ‘हरिनाकुस और उसका बेटा’, ‘आश्रम’ तथा ‘एक छोटी मछली की कहानी’ (हस्तलिखित)।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture still left guiding from the colonials who Stop India. A tradition that has been nurtured and blossoms while in the gardens of a hybrid race that also closet them selves within the bungalows in their minds.

सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा?

आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ.

प्रेम जनमेजय हिंदी व्यंग्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार और इस विध के सबसे बड़े संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो चुके हैं। उनके लेखन में साहित्य अपनी गरिमा के साथ विकसित होता है। अध्ययन और अनुभव के सहमेल से उनका रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन विशिष्ट बन गया है। प्रेम जनमेजय की एक बहुत बड़ी और अनुकरणीय विशेषता है—अपनी परंपरा के श्रेष्ठ रचनाकारों के कृतित्व को संजोना; उन रचनाकारों पर आलोचना पुस्तक संपादित करना। .

"दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी.

मुझे गर्व की अनुभूति कभी-कभी होती रहती है कि हिन्दी व्यंग्य-लेखन की इस विजय-यात्रा में बतौर दर्शक ही, मेरी भी एक विनम्र भूमिका रही है ।

समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।

श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी read more निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय

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